चित्तरंजन चव्हाण
बहुत सारे लोग एलोपॅथी का विरोध करते है, और आयुर्वेद का गुणगान करते रहते है. क्या तुम ऐसे लोगों में से एक हो? तो तुम्हें कुछ बातों विचार करना होगा.
पहली बात तो यह है, बचपन में तुम्हे कई प्रकार के एलोपॅथीक वॅक्सिन दिए गए, जिसके कारण तुम्हारे शरीर में गंभीर रोगों के खिलाप रोगप्रतिकारक शक्ति तैयार हो गयी. जैसे पोलियो, ट्यूबर क्युलेसिस (क्षयरोग), पीलिया आदि. फिर समय समय पर तुम्हे और भी वॅक्सिन लगवाने पड़े. इनके कारण ही आज तुम जिन्दा हो, नहीं तो कभी के मर जाते, या लूले-लंगड़े हो जाते. इसलिए तुम्हे एलोपॅथी का उपकार मानना चाहिए. लेकिन एलोपॅथी का उपकार मानने के बजाय उसका तिरस्कार और विरोध करना यह बात दिखा देती है कि तुम्हारे मन में उपकार भावना का अभाव है. और जिन लोगों में उपकार भावना का अभाव होता है, उनके जीवन में ढेर सारी समस्याएं आ जाती है.
वैसे ज्यादातर भारतीय लोगों की मानसिकता विचित्र है, जो उपकार भावना का अभाव दिखाती है. जैसे वे भैंस का दूध पीते है, लेकिन सुना है कभी उन्हें भैंस का गुणगान करते हुए? वह गुणगान तो गाय का ही करेंगे. उसी प्रकार पानी किसी और नदी का पियेंगे, लेकिन गुणगान तो गंगा नदी का ही करेंगे. सबसे बड़ी बात तो यह है की यह लोग विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के सभी फायदे ले लेंगे, लेकिन गुणगान तो धर्म और चमत्कारों का ही करेंगे.
खैर, मैं फिर से मूल विषय की तरफ आता हूं.
ठीक है, अगर एलोपॅथी का विरोध करना ही है, तो तुम्हें अपने विचारों से, अपनी मानसिकता से प्रामाणिक रहना चाहिये. तुम्हे आज से किसी भी एलोपॅथीक डॉक्टर के पास नहीं जाना चाहिए और ना ही किसी एलोपॅथीक दवा का उपयोग करना चाहिए, चाहे हार्ट अटॅक क्यों न आ जाए. अपने घर के बच्चों को किसी प्रकार का वॅक्सिन नहीं देना चाहिए, और ना ही कोई अलोपॅथीक दवा. क्या यह करने की हिम्मत है तुम में? या तुम्हारे विचार और कृति तुम्हारे दोहरे मापदंड के अनुसार होते है?
जब कभी तुम अपने विचारों से पीछे हटने की और एलोपॅथी की शरण में जाने की नौबत आ जाये (जो आएगी ही) तो एक बात को हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए. . . . चूं कि तुम्हारे मन में अलोपॅथी के लिए उपकार भावना नहीं है, अलोपॅथी उपचारों का तुम्हें 100 प्रतिशत फायदा नहीं होने वाला है. क्यों कि जिसका तुम तिरस्कार करते हो, उसका तो तुम्हे ठीक से फायदा नहीं पहुंचेगा. यह लॉ ऑफ़ अट्रॅक्शन का नियम है.
Great….