आधुनिक संन्यासी: आज़ादी, सादगी और सजग जीवन की नई सोच

महावीर सांगलीकर

Read this article in English: The Rise of Modern Sanyasis

जब हम संन्यासी शब्द सुनते हैं तो आमतौर पर हमारे ज़हन में एक ऐसा इंसान आता है जो घर-परिवार, पैसा और समाज छोड़कर कहीं जंगल या आश्रम में चला गया हो. लेकिन आधुनिक संन्यासी इस सोच से अलग हैं. वे दुनिया से भागते नहीं हैं, बल्कि दुनिया के बीच रहते हुए भी भीतर से आज़ाद रहते हैं. उनका त्याग बाहर से दिखाई नहीं देता, वह उनके सोचने, समझने और जीने के तरीके में नज़र आता है.

आधुनिक संन्यासी न तो भगवा कपड़े पहनते हैं, न ही इनका कोई विशेष ड्रेस कोड नहीं होता, और न ही खुद को कोई गुरु घोषित करते हैं. वह अपने अनुयायी, शिष्य, भक्त नहीं बनाते. उनका जीवन ही उनका संदेश होता है. वे तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, काम करते हैं और पैसा कमाते हैं, लेकिन इन सबके गुलाम नहीं बनते.

शादी, संपत्ति और बोझ से मुक्त जीवन

आधुनिक संन्यासी सोच-समझकर शादी न करने का फैसला लेते हैं. यह फैसला रिश्तों से डर की वजह से नहीं होता, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी, आज़ादी और भावनात्मक साफ़गोई की समझ से आता है. वे मजबूरी के रिश्तों की बजाय सच्चे साथ को महत्व देते हैं. समाज क्या कहेगा, इससे ज़्यादा उन्हें यह अहम लगता है कि वे खुद के साथ ईमानदार रहें.

इसी तरह वे घर, गाड़ी और बहुत सारी चीज़ें जोड़ने की होड़ में नहीं पड़ते. वे जानते हैं कि ज़रूरत से ज़्यादा सामान धीरे-धीरे इंसान को बांध लेता है. कम सामान और हल्का जीवन उन्हें खुली सांस लेने देता है. उनके लिए सादगी गरीबी नहीं है, बल्कि समझदारी है.

कुछ आधुनिक संन्यासी शादी तो करते हैं, अपने पारिवारिक कर्तव्य भी निभाते है, लेकिन अलिप्त और अन्तर्मुख जीवन जीते हैं.

कमाई भी, समझदारी भी

आधुनिक संन्यासी काम और पैसे से भागते नहीं हैं. वे मेहनत करते हैं और ईमानदारी से कमाते हैं. उनके लिए पैसा बुरा नहीं है, लालच बुरा है. पर्याप्त पैसा उन्हें यह आज़ादी देता है कि वे गलत जगह समझौता न करें, किसी के शोषण को सहन न करें और ज़िंदगी अपने तरीके से जी सकें.

साथ ही वे अपने भीतर भी लगातार काम करते रहते हैं. अपने डर, ग़लत धारणाओं, अपराधबोध और बचपन से मिली सोच को वे बिना डर के देखते हैं. वे सफलता, शादी, मर्द-औरत की भूमिका, राष्ट्रवाद और पहचान जैसे मुद्दों पर सवाल उठाते हैं. उनके लिए त्याग का मतलब सोच बंद करना नहीं, बल्कि अंधी मान्यताओं से बाहर निकलना है.

इनकी बड़ी विशेषता यह है कि यह अपने जीवनयापन के लिए भक्तों पर निर्भर नहीं होते, (वास्तव में यह लोग भक्त या शिष्य नहीं बनाते), बल्कि यह लोग खुद ही कमाते है. यह लोग खुद पर ही निर्भर होते है.

इंसान पहले, पहचान बाद में

आधुनिक संन्यासी खुद को धर्म, जाति, देश या नस्ल के दायरे में कैद नहीं करते. उनके लिए सरहदें नक्शे पर होती हैं, दिल में नहीं. अलग-अलग लोगों से मिलना, नई जगहें देखना, किताबें पढ़ना और बातचीत करना उन्हें इंसान के तौर पर बड़ा बनाता है. उनके लिए सबसे बड़ी पहचान इंसान होना है.

वे जातिवाद, नस्लवाद, लैंगिक भेदभाव और धार्मिक नफ़रत के साफ़ खिलाफ़ होते हैं. जहां भी अन्याय दिखता है, वे चुप नहीं रहते, चाहे उससे उन्हें नुकसान ही क्यों न हो. उनके लिए इंसाफ़ और बराबरी कोई नारा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के फैसलों का हिस्सा होता है.

डर से नहीं, समझ से बनी आध्यात्मिकता

आधुनिक संन्यासियों का रिश्ता धर्म से डर या अंधी मान्यता का नहीं होता. वे हर जगह की अच्छी बातों का सम्मान करते हैं, लेकिन जब धर्म सत्ता, डर और बंटवारे का ज़रिया बन जाता है, तो उससे दूरी बना लेते हैं. उनकी आध्यात्मिकता पूजा-पाठ से ज़्यादा जागरूकता, ज़िम्मेदारी और भीतर की ख़ामोशी से जुड़ी होती है.

वे अपनी मानसिक हालत की पूरी ज़िम्मेदारी लेते हैं. ज़िंदगी में जो भी तनाव या दुख है, उसके लिए वे समाज, रिश्तों या क़िस्मत को दोष नहीं देते. वे अपने पुराने ज़ख़्मों को समझते हैं, गिले-शिकवे छोड़ते हैं और भीतर मज़बूती पैदा करते हैं. उनकी शांति उधार की नहीं होती, वह समझ से पैदा होती है.

समय की क़ीमत और शांत असर

आधुनिक संन्यासी पैसे से ज़्यादा समय को अहम मानते हैं. वे ज़िंदगी को ज़्यादा कमाने के बजाय बेहतर जीने के हिसाब से रचते हैं. उनके पास सोचने, सीखने, लिखने, घूमने और लोगों से जुड़ने का वक़्त होता है. वे पूरी ज़िंदगी सीखते रहते हैं और नई समझ आने पर बिना अहंकार अपनी राय बदलने से नहीं डरते.

कई आधुनिक संन्यासी बिना चाहे भी दूसरों के लिए मिसाल बन जाते हैं. वे उपदेश नहीं देते, बस जैसे हैं वैसे जीते हैं. उनका जीवन दूसरों के दिल में सवाल खड़े करता है: क्या ज़िंदगी जीने का कोई और, ज़्यादा आज़ाद तरीका भी हो सकता है. बातचीत, लेखन या ऑनलाइन मंचों के ज़रिये वे लोगों को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं, मानने के लिए नहीं.

वे दुनिया से भागने वाले लोग नहीं होते. वे पर्यावरण, समाज और इंसानी मानसिक हालत को लेकर सजग रहते हैं. कम ख़र्च, कम उपभोग और प्रकृति के प्रति ज़िम्मेदारी उनके जीवन का हिस्सा होती है. वे समझते हैं कि अंदर का लालच ही बाहर की तबाही की जड़ है.

भले ही ऐसे लोग कम हों, लेकिन आधुनिक संन्यासी इंसानी चेतना में एक बड़े बदलाव का संकेत देते हैं. आज्ञा मानने से समझ की ओर, जमा करने से सादगी की ओर, और पहचान से इंसानियत की ओर. उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए आज़ादी, आध्यात्मिकता और सार्थक जीवन का एक नया रास्ता दिखाता है.

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