महावीर सांगलीकर
हरेक के जीवन में सुख और दुःख रहता है. कुछ लोगों के जीवन में सुख ज्यादा रहता है और दुःख कम. इसके उलट, कुछ लोगों के जीवन में सुख कम और दुःख ज्यादा है.
कुछ लोग सोचते है की जीवन में दुःख ही दुःख है, और यह हर जनम में होता है. इससे मुक्त होने के लिए हमें जन्म और मरण के चक्र से मुक्त होना चाहिए. इसेही मोक्ष कहा गया है.
मोक्ष की संकल्पना में विश्वास रखने वाले दो बातों को गृहीत रूप से मानते है. पहली बात यह कि पूर्वजन्म और पुनर्जन्म. दूसरी बात यह कि मोक्ष कोई एक जगह है, जहां जाने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता है. अब यह मान्यताएं कितनी सच है यह कोई नहीं जानता. और मान भी लिया कि बातें बिल्कुल सच हैं, तो भी कुछ सवाल उभरते हैं.
वास्तव में जीवन में आनेवाले दुखों से डरकर जीवन मरण के चक्र से मुक्त होने का सपना देखना क्या एक सही बात है? हमें मुझे तो यह एक पलायनवाद लगता है.
जीवन में आनेवाले दुखों से डरकर जीवन मरण के चक्र से मुक्त होने के बजाय जो जीवन मिला है, उसे अच्छी तरह से जीना चाहिए. इस बात को भी याद रखना चाहिए कि हर एक के जीवन में सुख और दुःख दोनों होते हैं, और बिना दुःख के सुख की अनुभूति हो नहीं सकती.
जीवन में आनेवाले दुःखों से भागने के बजाय उनका सामना कैसे किया जाय, उनकी तीव्रता कैसे कम की जा सकती है, इस बारे में सोचना चाहिए.
मोक्ष की कल्पना एक भ्रम भी हो सकती है. और यह कल्पना सच भी हो तो वर्तमान जीवन कैसे जीना है, इसे महत्त्व देना चाहिए, न कि अगले जन्म की चिंता में वर्तमान जीवन से भागने को. मोक्ष के चक्कर में वर्तमान जीवन के आनंद से दूर रहना , जीवन से दूर भागना, परिवार, समाज, देश आदि के प्रति अपने कर्तव्यों से दूर भागना एक मूर्खता मात्र है.
असल बात यह है कि जीवन एक अवसर है. हमें सोचने, समझने, प्यार करने, सीखने, कोई महान रचनात्मक काम करने और समाज के लिए कुछ करने का मौका मिला है. अगर हम मोक्ष की ही चिंता में डूबे रहेंगे, उसके लिए घर-परिवार छोड़ दें, तो वर्तमान का आनंद कैसे ले पाएंगे? ज्ञान और हुनर पाना, रचनात्मकता, अपने बच्चों की हंसी, परिवार का साथ, दोस्तों के साथ बातचीत, समाज में योगदान – ये सब जीवन के असली रंग हैं.
कई बार लोग मोक्ष के नाम पर अपने कर्तव्यों से भी दूर भागने लगते हैं. वे मान लेते हैं कि संसार तो माया है, इसलिए इसमें ज्यादा उलझना नहीं चाहिए. लेकिन यह एक पलायनवादी मानसिकता ही है.
जीवन में समस्याएं आएंगी. हार भी मिलेगी. लेकिन इन्हीं के बीच खड़े रहकर, संघर्ष करते हुए, मुस्कुराते हुए जीना ही असली साहस है. जो व्यक्ति कठिनाइयों से भागता नहीं, बल्कि उनका सामना करता है, वही सच में मजबूत बनता है.
इसलिए ज्यादा जरूरी यह है कि हम मोक्ष के सपनों में खोने के बजाय वर्तमान को समझें और जिएं. अपने जीवन को बेहतर बनाएं, दूसरों के जीवन में खुशी जोड़ें, समाज के लिए कुछ अच्छा करें.
अंत में सवाल यह नहीं है कि मोक्ष है या नहीं. असली सवाल यह है कि जो जीवन हमारे हाथ में है, क्या हम उसे पूरी तरह जी रहे हैं? अगर हम पूरे मन से, जिम्मेदारी के साथ और आनंद के साथ जीवन जी लें, तो शायद हमें किसी और मुक्ति की जरूरत ही महसूस न हो.
मनुष्य को हमेशा वर्तमान में जीना चाहिए, और वर्तमान जीवन में जीना चाहिए. तथाकथित अगले जन्म के दुःख टालने के लिए इस जन्म को व्यर्थ गंवाना ठीक नहीं है.
यह सब अपनी अपनी सोच है । साधू संतो का कार्य भी कुछ कम नही है अनेको जन्म होने पर मोक्ष ही अंतिम सत्य है ।
बचपन से आपको जो बताया गया है, उसी को आप सच मानती हैं… यह एक ब्रेन वॉशिंग है.