महावीर सांगलीकर
ध्यान और आध्यात्म एक धोखा है! इससे सावधान रहें और इनके बजाय खुलकर, आज़ादी से और खुशी से जीना सीखें!
आज के समय में ध्यान और आध्यात्म अब व्यक्तिगत अनुभव नहीं रह गए हैं. वे एक बड़े उद्योग का रूप ले चुके हैं. सोशल मीडिया पर हर तरफ़ गुरु हैं, महंगे रिट्रीट हैं, मेडिटेशन ऐप हैं और मोटिवेशनल भाषण हैं, जो बार-बार यही कहते हैं कि अगर आप ध्यान नहीं करते, भीतर नहीं झांकते, तो आपकी ज़िंदगी अधूरी है. यह डर पैदा किया जाता है कि आप गलत तरीके से जी रहे हैं.
लेकिन इस सोच पर सवाल उठाना बेहद ज़रूरी है. यह लेख यह नहीं कहता कि कभी चुप बैठना या आत्मचिंतन करना हमेशा बेकार होता है. सवाल उस अंधी आस्था पर है, उस व्यापारिक सोच पर है, जिसके तहत ध्यान और आध्यात्म को आज़ादी का रास्ता नहीं, बल्कि लोगों को वास्तविक जीवन से दूर करने का साधन बना दिया गया है.
भीतर भागने का भ्रम
ध्यान और आध्यात्म अक्सर यह सिखाते हैं कि दुख से मुक्ति पाने के लिए दुनिया से दूरी बनानी होगी. कहा जाता है कि आंखें बंद करो, विचारों को छोड़ो, भावनाओं से अलग हो जाओ और शांति अपने आप मिल जाएगी. लेकिन ज़िंदगी इस तरह काम नहीं करती.
अधिकतर दुख सोच की वजह से नहीं, बल्कि जीवन की परिस्थितियों की वजह से होते हैं. आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक अन्याय, रिश्तों की टूटन, उद्देश्य की कमी और दबाई गई इच्छाएं — ये सब वास्तविक समस्याएं हैं. इनसे निपटने के लिए कार्रवाई चाहिए, न कि केवल भीतर बैठकर सब कुछ देखने की आदत.
जब इंसान को बार-बार यह सिखाया जाता है कि वह सिर्फ़ साक्षी बना रहे, तो धीरे-धीरे वह निष्क्रिय हो जाता है. उसे लगता है कि प्रतिक्रिया देना, विरोध करना या बदलाव की कोशिश करना “अज्ञान” है. इस तरह पलायन को ज्ञान का नाम दे दिया जाता है. सच्चाई यह है कि जीवन से भागना कोई ऊंचाई नहीं, बल्कि डर का दूसरा रूप है.
आध्यात्म का व्यापार
अगर आध्यात्म सच में आज़ादी देता, तो वह आज एक व्यवस्थित उद्योग न बन चुका होता. आज आध्यात्म ब्रांड बन गया है. गुरु सेलिब्रिटी हैं, कोर्स बिकते हैं, सब्सक्रिप्शन मॉडल हैं और “ऊंचे स्तर” का ज्ञान पाने के वादे किए जाते हैं.
लोगों को यह एहसास दिलाया जाता है कि वे अधूरे हैं, जागरूक नहीं हैं और उन्हें किसी मार्गदर्शक की ज़रूरत है. फिर वही व्यवस्था समाधान बेचती है, अक्सर महंगे दामों पर. इससे व्यक्ति अपनी समझ और विवेक पर भरोसा खो देता है और दूसरों पर निर्भर हो जाता है.
जहां सवाल पूछने को अहंकार कहा जाए, और असहमति को अज्ञान, वहां आज़ादी नहीं हो सकती. जो व्यवस्था लोगों को सोचने से रोकती है और आज्ञाकारिता सिखाती है, वह आध्यात्म नहीं, बल्कि नियंत्रण का साधन है.
इलाज नहीं, भावनाओं का दमन
आधुनिक आध्यात्म का एक बड़ा नुकसान यह है कि वह भावनाओं को दबाने को शांति मान लेता है. गुस्से को गलत कहा जाता है, इच्छा को कमजोरी, महत्वाकांक्षा को अहंकार और दुख को अज्ञान. नतीजा यह होता है कि इंसान अपनी भावनाओं को समझने के बजाय उनसे लड़ने लगता है.
लेकिन दबाई गई भावनाएं खत्म नहीं होतीं. वे भीतर जमा होती रहती हैं और बाद में चिंता, अवसाद, चिड़चिड़ापन, अपराधबोध और खालीपन बनकर सामने आती हैं. बाहर से शांत दिखने वाला व्यक्ति भीतर से टूटा हुआ भी हो सकता है.
सच्चा मानसिक स्वास्थ्य भावनाओं से भागने में नहीं, बल्कि उन्हें पहचानने, स्वीकार करने और सही दिशा देने में है. इसके लिए मनोविज्ञान, संवाद, आत्मविश्लेषण और ज़रूरत पड़ने पर थेरेपी कहीं ज़्यादा उपयोगी हैं.
सबके लिए एक ही शांति झूठ है
ध्यान को अक्सर ऐसा पेश किया जाता है जैसे वह हर इंसान के लिए ज़रूरी और लाभकारी हो. अगर किसी को ध्यान से फायदा न हो, तो दोष उसी पर डाल दिया जाता है. कहा जाता है कि वह सही तरीके से नहीं कर रहा, या अभी तैयार नहीं है.
यह सोच गलत है. हर इंसान अलग होता है. कई लोगों के लिए चुप बैठना और अपने विचारों में डूबना बेचैनी और डर को और बढ़ा देता है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्होंने जीवन में गहरा मानसिक या भावनात्मक आघात झेला हो.
जहां किसी अभ्यास पर सवाल उठाने की अनुमति न हो, वहां वह अभ्यास ज्ञान नहीं, बल्कि कट्टरता बन जाता है. सच्ची आज़ादी का मतलब है यह कह पाने की क्षमता कि “यह मेरे लिए नहीं है”.
तो फिर क्या करें?
अगर आप सच में आज़ादी, संतुलन और खुशी चाहते हैं, तो ऐसे रास्ते मौजूद हैं जो ज़मीन से जुड़े हुए हैं और इंसान को भीतर से मज़बूत बनाते हैं. ध्यान और आध्यात्म एक धोखा? सावधान रहें — और इनके बजाय खुलकर, आज़ादी से और खुशी से जीना सीखें
असली दुनिया में जिएं, भीतर की कल्पना में नहीं
ज़िंदगी सोचने से नहीं, करने से बदलती है. भीतर झांकते रहने के बजाय बाहर की दुनिया में सक्रिय होना ज़्यादा ज़रूरी है. नई चीज़ें सीखना, अपने काम में बेहतर होना, आत्मनिर्भर बनना और समस्याओं का व्यावहारिक हल निकालना….यही जीवन को आगे बढ़ाता है.
अर्थ और संतोष किसी ध्यान अवस्था से नहीं, बल्कि अपने प्रयास और योगदान से पैदा होते हैं. जब इंसान आगे बढ़ता है, तो आत्मविश्वास आता है और वही आत्मविश्वास मन को स्थिर करता है.
शरीर का ख़याल रखें
कई मानसिक परेशानियां शरीर की अनदेखी से पैदा होती हैं. नींद पूरी न होना, शारीरिक गतिविधि की कमी और असंतुलित भोजन सीधे मन को प्रभावित करते हैं. कमजोर शरीर से स्थिर मन की उम्मीद करना व्यर्थ है.
ज्ञान या शांति खोजने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि आपका शरीर ठीक है या नहीं. अक्सर साधारण शारीरिक सुधार से ही मन हल्का हो जाता है.
सच्चे रिश्ते बनाएं
इंसान सामाजिक प्राणी है. अकेलापन अक्सर आध्यात्म के नाम पर बढ़ता है. लेकिन सच्चाई यह है कि खुलकर बात करना, किसी से जुड़ना, झगड़ना, सुलह करना और साथ हंसना — ये सब मन को गहराई से ठीक करते हैं.
कोई अपना जब आपको ध्यान से सुनता है, तो वह अनुभव किसी भी साधना से ज़्यादा सुकून दे सकता है. रिश्ते हमें ज़मीन से जोड़ते हैं.
तर्क और समझ को अपनाएं
चमत्कारों और रहस्यों की जगह समझ और विवेक को चुनना ज़्यादा स्वस्थ है. मनोविज्ञान, दर्शन और इंसानी व्यवहार को समझने से हम अपने फैसलों और आदतों को बेहतर ढंग से देख पाते हैं.
सवाल पूछना, अनुभव से सीखना और तर्क के आधार पर निर्णय लेना — यही असली आत्मचिंतन है.
रचनात्मक बनिए
रचनात्मकता भावनाओं को बाहर निकलने का प्राकृतिक रास्ता देती है. लिखना, संगीत, खेल, कला या कोई भी रचनात्मक काम मन को सक्रिय और जीवंत रखता है. इससे भावनाएं दबती नहीं, बल्कि बहती हैं.
यह जीवन से जुड़ी हुई साधना है, जो इंसान को और ज़्यादा जीवित महसूस कराती है.
ज़िंदगी को जैसा है, वैसा स्वीकार करें
खुशी का मतलब यह नहीं कि जीवन में कभी अशांति न हो. ज़िंदगी में संघर्ष होंगे, इच्छाएं होंगी, असफलताएं होंगी और दुख भी होगा. यही जीवन की सच्चाई है.
इनसे ऊपर उठने की कोशिश अक्सर खालीपन देती है, जबकि इन्हीं के बीच जीना जीवन को गहराई देता है. स्वीकार करना ही समझ की शुरुआत है.
भ्रम नहीं, ज़िंदगी चुनिए
ध्यान और आध्यात्म सवालों से ऊपर नहीं हैं. आज के समय में वे कई बार लोगों को कर्म, ज़िम्मेदारी और वास्तविकता से दूर ले जाते हैं.
साफ़ सोचिए, हिम्मत से काम कीजिए, ईमानदारी से प्यार कीजिए और पूरी ज़िंदगी जिएं.
एक सक्रिय, जागरूक और ज़िम्मेदार इंसानी जीवन ही असल आज़ादी की सबसे सच्ची जगह है.
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